अल्जीरिया के राष्ट्रपति बूतेफ़्लीका ने आख़िरकार इस्तीफ़ा दिया

अल्जीरिया की सरकारी मीडिया के मुताबिक़ राष्ट्रपति अब्दुलअज़ीज़ बूतेफ़्लीका ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उनके ख़िलाफ़ कई सप्ताह से देश भर में व्यापक प्रदर्शन हो रहे थे.

बीस सालों से सत्ता पर क़ाबिज़ बूतेफ़्लीका पहले ही कह चुके थे कि वो इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे और 28 अप्रैल को अपना कार्यकाल समाप्त होने पर पद छोड़ देंगे.

हालांकि प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे लोगों ने कहा था कि पद छोड़ने का वादा काफ़ी नहीं है और वो तुरंत पद छोड़ें.

अल्जीरिया की शक्तिशाली सेना ने 82 वर्षीय बूतेफ़्लीका को देश की सत्ता संभालने के अयोग्य घोषित करते हुए उनसे इस्तीफ़ा देने के लिए कह दिया था.

प्रदर्शनकारियों ने देश के राजनीतिक ढांचे में मूलभूत बदलाव करने की मांग की है.

अल्जीरिया की सत्ता में सेना अहम भूमिका निभाती है. अब इसमें भी बदलाव की मांग की जा रही है.

सत्ताधारी नेशनल लिब्रेशन फ़्रंट ने सुधारों के मुद्दे पर राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाने का निर्णय लिया है.

इससे पहले बूतेफ़्लीका ने अपनी उम्मीदवारी रद्द करते हुए इस महीने होने वाले चुनावों को टाल दिया था.

नए चुनाव कब होंगे, ये निर्णय लिया जाना अभी बाक़ी है.

बूतेफ़्लीका को छह साल पहले दिल का दौरा पड़ा था और तब से वो सार्वजनिक रूप से कम ही दिखाई दिए थे.

फ्रांस के शासनकाल के अंतिम दिनों में बूतेफ़्लीका एक सैन्य अधिकारी थे. वो एक दशक से अधिक तक देश के विदेश मंत्री भी रहे और उन्होंने तख़्तापलट में भी हिस्सा लिया था.

अब्दुलअज़ीज़ बूतेफ़्लीका धीरे-धीरे 1999 में देश की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे थे. इसके पीछे उनकी इच्छी भी थीं और परिस्थितियां भी.

उनका मुख्य काम देश और अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण करना था. लेकिन पहले उन्हें अल्जीरिया के हिंसक और बर्बर गृह युद्ध को पूरी तरह ख़त्म करना था जो 1990 के दशक में चुनावों में इस्लामिक सालवेशन फ़्रंट की जीत से शुरू हुआ था. अल्जीरिया की सेना ने इस जीत को मान्यता नहीं दी थी.

स्थानीय इस्लामी लड़ाकों को कई तरह की छूट दी गई थी. ये रणनीति शुरू शुरू में तो कामयाब रही लेकिन देश के विशाल रेगिस्तानी इलाक़े में अल-क़ायदा के नेतृत्व में शुरू हुए नए संघर्ष ने हालात फिर पहले जैसे ही कर दिए.

समय के साथ राष्ट्रपति बूतेफ़्लीका ने पश्चिमी देशों के साथ रिश्तों को लेकर नज़रिया बदला और नए खुलेपन और आर्थिक सुधारों के साथ आगे आए लेकिन इससे देश की तेल राजस्व पर निर्भरता कम नहीं हुई, न ही सार्वजनिक क़र्ज़ कम हुआ और ना ही बढ़ रही बेरोज़गारी पर लगाम लगी.

मोरक्को में 1937 में पैदा हुए बूतेफ़्लीका ने बीस सालों तक अल्जीरिया की सत्ता संभाली. उन्होंने हर बार इकतरफ़ा चुनाव जीता. उन्होंने अपने सामने कभी किसी राजनीतिक प्रतिद्वंदी का क़द नहीं बढ़ने दिया. अल्जीरिया में उनके दौर में ऐसा कोई नेता नहीं आ सका जो उन्हें या उनकी सत्ताधारी नेशनल लिब्रेशन फ़्रंट पार्टी को बदल सके.

हाल के सालों में देश की सेना और ख़ुफ़िया सेवा के कई वरिष्ठ अधिकारियों को चुपचाप किनारे लगा दिया गया.

वो व्यक्ति जिसने एक बार कहा था कि वो तीन चौथाई राष्ट्रपति बनना पसंद नहीं करेंगे, को 2013 में दिल का दौरा पड़ने के बाद व्हीलचेयर पर अपने अंतिम साल बिताने पड़े. वो सार्वजनिक रूप से कम ही दिखे और ये बहस तेज़ हो गई कि सत्ता असल में किसके हाथों में है.

बावजूद इसके, 2019 में उन्हें पांचवी बार राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बना दिया गया. लेकिन इसका देश में व्यापक विरोध हुआ और देश पर सत्ताधारी पार्टी की पकड़ भी ढीली हुई.

इसे सोची समझी योजना कहा जाए, या परिस्थितियों का नतीजा, लेकिन बूतेफ़्लीका अल्जीरिया के उतार-चढ़ाव भरे दौर में भी अपने पद पर बने रहने में कामयाब रहे. पड़ोसी देशों में जब 2011 में उथल-पुथल मची और कई दीर्घकालिक नेताओं को जनता ने हटा दिया, बूतेफ़्लीका अपने पद पर बने रहने में कामयाब रहे.

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