पश्चिम बंगाल में मोदी का केवल शोर है या सच भी -लोकसभा चुनाव 2019
जनता की ओर से अच्छी प्रतिक्रिया मिलने पर ममता स्टेज पर एक छोर से दूसरी छोर तक हाथ में माइक पकड़े चलती हैं और कहती हैं, "मैं दो मिनट ख़ामोश रहती हूँ, आप ज़ोर से बोलो, चौकीदार..."
भीड़ में 'चोर है' की आवाज़ दो मिनट तक गूँजती रहती है.
पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के आख़िरी दौर का चुनावी माहौल काफ़ी गर्म है. यहाँ तृणमूल कांग्रेस और दूसरी पार्टियों की रैलियां हर जगह हो रही हैं.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस की नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सबसे अधिक रैलियां और रोड शो कर रही हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार वह जिस तरह से नरेंद्र मोदी पर प्रहार कर रही हैं उससे साफ़ ज़ाहिर है कि वह भाजपा से परेशान हैं.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस की नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सबसे अधिक रैलियां और रोड शो कर रही हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार वह जिस तरह से नरेंद्र मोदी पर प्रहार कर रही हैं उससे साफ़ ज़ाहिर है कि वह भाजपा से परेशान हैं.
कोलकता से 100 किलोमीटर दूर आदमपुर गाँव की जनसंख्या 200 के क़रीब है. ये बसिरहाट चुनावी क्षेत्र का एक गाँव है जहाँ टीएमसी की उम्मीदवार फ़िल्म स्टार नुसरत जहाँ चुनावी मैदान में हैं.
मैंने गाँव वालों से पूछा यहाँ वोट माँगने कोई उम्मीदवार आया तो जवाब आया, नहीं. इसके बावजूद उनके अनुसार लोगों ने टीएमसी के पक्ष में वोट डालने का मन बना लिया है.
एक 27 वर्षीय युवा ने कहा, "ममता दीदी ने उनके स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल दी है. हमें चावल मिलता है. हमारे गाँव तक आने वाली सड़क बना दी गई. हमारा जीवन सुखी है. सीपीएम राज में हम ग़रीबी से दुखी रहते थे."
आदमपुर से लगे एक और छोटे से गाँव के बाहर मेन रोड पर कुछ मुसलमान बैठे बातचीत कर रहे थे. वो एक आवाज़ में ममता बनर्जी के पक्ष में बोलते हैं.
मैंने पूछा कि कुछ लोग कहते हैं कि ममता पश्चिम बंगाल के 30 प्रतिशत मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर रही हैं तो वहाँ बैठे मोहम्मद बशीर मुल्ला, जो एक ज़माने में सीपीएम के समर्थक थे, कहते हैं दीदी ने उनके समुदाय को सुरक्षा और सम्मान दिया है.
मुल्ला बताते हैं, "हम इस राज्य में टोपी और दाढ़ी के साथ अपनी पहचान के साथ सीना तान कर घूम सकते हैं जो दूसरे राज्यों के मुसलमान मोदी राज में नहीं कर सकते."
पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाक़ों में प्रवेश करें तो आपका स्वागत टीएमसी के झंडों और ममता बनर्जी के पोस्टरों से होता है.
उत्तर और पश्चिम भारत में जगह-जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुस्कुराता हुआ चेहरा पोस्टरों और बिलबोर्ड में अक्सर देखने को मिल जाता है.
पश्चिम बंगाल के शहरों और देहातों मे ऐसे पोस्टर कम ही दिखायी देते हैं. यहाँ तृणमूल के झंडे और ममता बनर्जी के पोस्टर आपका पीछा नहीं छोड़ते.
यहाँ नरेंद्र मोदी का नाम लेने वाले बहुत कम मिलेंगे. इस राज्य में 'दीदी' के नाम से पहचाने जानी वाली ममता बनर्जी अधिक लोकप्रिय नज़र आती हैं.
उत्तर भारत में नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता है पर पश्चिम बंगाल में ममता के सामने कोई नहीं है.
सोमवार को डायमंड हार्बर चुनावी क्षेत्र में उनके भाषण के लिए सैकड़ों लोग जमा थे. ज़बर्दस्त गर्मी और रमज़ान के बावजूद लोग अपने नेता का दीदार करने आए थे.
भीड़ में मौजूद समी मुल्ला ने कहा, "मैं मरते दम तक दीदी का साथ नहीं छोड़ूँगा."
उनके क़रीब खड़ी वहीदा गर्व से कहती हैं, "यहाँ केवल दीदी की लहर है." अनिक बोस नामी एक युवा ने कहा, "दीदी बंगाल की शेरनी हैं."
इस चुनावी क्षेत्र से टीएमसी के उम्मीदवार अभिषेक बनर्जी मैदान में हैं जो ममता बनर्जी के भतीजे भी हैं और लोगों की माने तो उनकी वारिस भी. अभिषेक यहाँ से पिछली बार भी चुनाव जीते थे.
ममता बनर्जी ने 2011 के विधानसभा चुनाव में 34 वर्ष तक राज करने वाले वामपंथी मोर्चे को उखाड़ फेंका था. लगातार चुनाव जीतने के कारण उनकी पार्टी की जड़ें शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में फैली हुई हैं और मज़बूत हैं.
भीड़ में 'चोर है' की आवाज़ दो मिनट तक गूँजती रहती है.
पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के आख़िरी दौर का चुनावी माहौल काफ़ी गर्म है. यहाँ तृणमूल कांग्रेस और दूसरी पार्टियों की रैलियां हर जगह हो रही हैं.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस की नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सबसे अधिक रैलियां और रोड शो कर रही हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार वह जिस तरह से नरेंद्र मोदी पर प्रहार कर रही हैं उससे साफ़ ज़ाहिर है कि वह भाजपा से परेशान हैं.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस की नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सबसे अधिक रैलियां और रोड शो कर रही हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार वह जिस तरह से नरेंद्र मोदी पर प्रहार कर रही हैं उससे साफ़ ज़ाहिर है कि वह भाजपा से परेशान हैं.
कोलकता से 100 किलोमीटर दूर आदमपुर गाँव की जनसंख्या 200 के क़रीब है. ये बसिरहाट चुनावी क्षेत्र का एक गाँव है जहाँ टीएमसी की उम्मीदवार फ़िल्म स्टार नुसरत जहाँ चुनावी मैदान में हैं.
मैंने गाँव वालों से पूछा यहाँ वोट माँगने कोई उम्मीदवार आया तो जवाब आया, नहीं. इसके बावजूद उनके अनुसार लोगों ने टीएमसी के पक्ष में वोट डालने का मन बना लिया है.
एक 27 वर्षीय युवा ने कहा, "ममता दीदी ने उनके स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल दी है. हमें चावल मिलता है. हमारे गाँव तक आने वाली सड़क बना दी गई. हमारा जीवन सुखी है. सीपीएम राज में हम ग़रीबी से दुखी रहते थे."
आदमपुर से लगे एक और छोटे से गाँव के बाहर मेन रोड पर कुछ मुसलमान बैठे बातचीत कर रहे थे. वो एक आवाज़ में ममता बनर्जी के पक्ष में बोलते हैं.
मैंने पूछा कि कुछ लोग कहते हैं कि ममता पश्चिम बंगाल के 30 प्रतिशत मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर रही हैं तो वहाँ बैठे मोहम्मद बशीर मुल्ला, जो एक ज़माने में सीपीएम के समर्थक थे, कहते हैं दीदी ने उनके समुदाय को सुरक्षा और सम्मान दिया है.
मुल्ला बताते हैं, "हम इस राज्य में टोपी और दाढ़ी के साथ अपनी पहचान के साथ सीना तान कर घूम सकते हैं जो दूसरे राज्यों के मुसलमान मोदी राज में नहीं कर सकते."
पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाक़ों में प्रवेश करें तो आपका स्वागत टीएमसी के झंडों और ममता बनर्जी के पोस्टरों से होता है.
उत्तर और पश्चिम भारत में जगह-जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुस्कुराता हुआ चेहरा पोस्टरों और बिलबोर्ड में अक्सर देखने को मिल जाता है.
पश्चिम बंगाल के शहरों और देहातों मे ऐसे पोस्टर कम ही दिखायी देते हैं. यहाँ तृणमूल के झंडे और ममता बनर्जी के पोस्टर आपका पीछा नहीं छोड़ते.
यहाँ नरेंद्र मोदी का नाम लेने वाले बहुत कम मिलेंगे. इस राज्य में 'दीदी' के नाम से पहचाने जानी वाली ममता बनर्जी अधिक लोकप्रिय नज़र आती हैं.
उत्तर भारत में नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता है पर पश्चिम बंगाल में ममता के सामने कोई नहीं है.
सोमवार को डायमंड हार्बर चुनावी क्षेत्र में उनके भाषण के लिए सैकड़ों लोग जमा थे. ज़बर्दस्त गर्मी और रमज़ान के बावजूद लोग अपने नेता का दीदार करने आए थे.
भीड़ में मौजूद समी मुल्ला ने कहा, "मैं मरते दम तक दीदी का साथ नहीं छोड़ूँगा."
उनके क़रीब खड़ी वहीदा गर्व से कहती हैं, "यहाँ केवल दीदी की लहर है." अनिक बोस नामी एक युवा ने कहा, "दीदी बंगाल की शेरनी हैं."
इस चुनावी क्षेत्र से टीएमसी के उम्मीदवार अभिषेक बनर्जी मैदान में हैं जो ममता बनर्जी के भतीजे भी हैं और लोगों की माने तो उनकी वारिस भी. अभिषेक यहाँ से पिछली बार भी चुनाव जीते थे.
ममता बनर्जी ने 2011 के विधानसभा चुनाव में 34 वर्ष तक राज करने वाले वामपंथी मोर्चे को उखाड़ फेंका था. लगातार चुनाव जीतने के कारण उनकी पार्टी की जड़ें शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में फैली हुई हैं और मज़बूत हैं.
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