क्या आर्थिक आरक्षण का पहला 'दुष्परिणाम' होगा जाट आंदोलन?
मोदी-शाह की जोड़ी के जिस क़दम को मास्टर स्ट्रोक बताया जा रहा था, वही मास्टर स्ट्रोक उनके लिए कुछ तबक़ों में मुश्किलें खड़ी करता हुआ दिख रहा है.
सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण से संकेत लेते हुए जाटों ने केंद्र की सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग का झंडा फिर से बुलंद कर दिया है.
जाट कह रहे हैं, ''चूंकि प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष ने साल 2015 और फिर उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले किया गया वायदा पूरा नहीं किया इसलिए वो 2019 आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार सुनिश्चित करेंगे.''
पिछले हफ़्ते राजधानी दिल्ली में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और मध्य प्रदेश के जाट नेताओं का जमावड़ा हुआ जिसके बाद बिरादिरी के नेता कह रहे हैं कि बीजेपी नेताओं को जाट गांवों में घुसने नहीं दिया जाएगा.
इन जाट नेताओं के मुताबिक़ बीजेपी ने न सिर्फ़ आरक्षण पर किया गया अपना वायदा पूरा नहीं किया बल्कि इसका इस्तेमाल दूसरे समुदायों और उनमें दूरी पैदा करने के लिए किया गया है, जैसा कि हरियाणा में साल 2016 में सामने आया.
जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़े नेता दावा कर रहे हैं कि हिंदी पट्टी, उत्तर और पश्चिम को मिलाकर 14 सूबों में उनकी ख़ासी आबादी है और कम से कम 130 सीटों पर किसी भी उम्मीदवार की हार-जीत में समुदाय के वोटों की अहम भूमिका होती है, इस बार समुदाय इसका इस्तेमाल बीजेपी के ख़िलाफ़ करेगा.
हालांकि इसके उलट बागपत में जाटों के बड़े नेता और चौधरी चरण सिंह के वारिस अजित सिंह को लोकसभा चुनावों में हराने वाले बीजेपी नेता सतपाल सिंह इन धमकियों को कुछ लोगों की सोच बताते हैं और दावा करते हैं कि अभी भी समुदाय का अधिकांश वर्ग नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यक़ीन रखता है और 2019 आम चुनावों में भी बीजेपी के साथ खड़ा रहेगा.
पूर्व आईपीएस सतपाल सिंह कहते हैं कि जितने जाने-माने जाट नेता हैं वो बीजेपी के साथ हैं.
''याचना नहीं रण होगा, संग्राम महाभीषण होगा,'' ऑल इंडिया जाट आरक्षण बचाओ महाआंदोलन के प्रमुख संयोजक धर्मवीर चौधरी भावुक होकर बातों के बीच ये नारे लगाने लगते हैं और कहते हैं, ''जाट ख़ुद को ठगा सा महसूस कर रहा है, उसके वोट से बीजेपी ने केंद्र और फिर उत्तर प्रदेश में कुर्सी तो हासिल कर ली लेकिन उसे उसका हक़ नहीं दिया गया.''
जाट नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जिस बैठक का ज़िक्र कर रहे हैं वो 26 मार्च, 2015 को सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के बाद हुई थी. इस फ़ैसले में अदालत ने कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार के ज़रिये जाटों को पिछड़ी जातियों की श्रेणी में केंद्र में दिए गए आरक्षण को रद्द कर दिया था.
उस बैठक के बाद बीजेपी नेता ओपी धनकड़ ने मीडिया से कहा था कि समुदाय ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि वो अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका दर्ज करवायें और अगर उसमें किसी तरह की दिक्क़त आती है तो विधायिका जाट आरक्षण मामले का निपटारा करे.
ओपी धनकड़ ने कहा कि प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि 'इसका जो भी रास्ता निकलेगा सरकार उसमें आगे बढ़ेगी.'
इस बैठक के बाद तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय समिति भी बनाई थी लेकन जाट नेताओं के मुताबिक़ इसकी एक भी बैठक नहीं हुई.
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के यशपाल मलिक दावा करते हैं कि बीजेपी को जाटों की याद फिर साल 2017 में उत्तर प्रदेश चुनावों के पहले आई जब अमित शाह ने समुदाय के लोगों को बैठक के लिए बुलाया और समर्थन का आग्रह किया.
2009 से कई बड़े जाट आंदोलनों का सामना कर चुकी मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने ठीक आम चुनावों से पहले 4 मार्च, 2014 को जाटों को केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में ओबीसी वर्ग के भीतर आरक्षण दे दिया था.
लेकिन इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और अदालत ने इसे 17 मार्च, 2015 को निरस्त कर दिया.
यूपीए सरकार का ये आरक्षण उन नौ सूबों के लिए लागू था जहां जाट ओबीसी सूची में शामिल हैं.
साल 1998 में राजस्थान में जाटों को दिए गए आरक्षण के बाद इस समुदाय को दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, बिहार, उत्तराखंड और हरियाणा में भी ये हक़ हासिल हो चुका था.
हरियाणा का मामला हालांकि फ़िलहाल अदालत में है.
सत्तर के दशक में बने मंडल कमीशन से बाहर रह गए जाट समुदाय के लोग कहते हैं कि निजीकरण और वैश्वीकरण की वजह से सरकारी नौकरियों में कमी आई है और शैक्षणिक रूप से पिछड़े जाटों को प्राइवेट सेक्टर में नौकरी मिलना मुश्किल है इसलिए उन्हें ओबीसी कैटेगरी में रिज़र्वेशन मिलना चाहिए.
यशपाल मलिक कहते हैं, "जिस ओबीसी लिस्ट में लागू होते वक़्त 1200 जातियां शामिल थीं उसकी संख्या अब 2453 जातियों तक पहुंच गई हैं तो फिर जाटों को उस सूची से अलग क्यों रखा जा रहा है?"
बीजेपी के जाट नेता सतपाल सिंह कहते हैं कि वो ख़ुद समुदाय को आरक्षण दिए जाने का समर्थन करते हैं लेकिन समुदाय को ये समझना होगा कि आरक्षण से ही सब मसला हल नहीं होगा और फिर सामान्य वर्ग को मिले आरक्षण से जाटों को भी तो लाभ होगा.
सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण से संकेत लेते हुए जाटों ने केंद्र की सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग का झंडा फिर से बुलंद कर दिया है.
जाट कह रहे हैं, ''चूंकि प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष ने साल 2015 और फिर उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले किया गया वायदा पूरा नहीं किया इसलिए वो 2019 आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार सुनिश्चित करेंगे.''
पिछले हफ़्ते राजधानी दिल्ली में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और मध्य प्रदेश के जाट नेताओं का जमावड़ा हुआ जिसके बाद बिरादिरी के नेता कह रहे हैं कि बीजेपी नेताओं को जाट गांवों में घुसने नहीं दिया जाएगा.
इन जाट नेताओं के मुताबिक़ बीजेपी ने न सिर्फ़ आरक्षण पर किया गया अपना वायदा पूरा नहीं किया बल्कि इसका इस्तेमाल दूसरे समुदायों और उनमें दूरी पैदा करने के लिए किया गया है, जैसा कि हरियाणा में साल 2016 में सामने आया.
जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़े नेता दावा कर रहे हैं कि हिंदी पट्टी, उत्तर और पश्चिम को मिलाकर 14 सूबों में उनकी ख़ासी आबादी है और कम से कम 130 सीटों पर किसी भी उम्मीदवार की हार-जीत में समुदाय के वोटों की अहम भूमिका होती है, इस बार समुदाय इसका इस्तेमाल बीजेपी के ख़िलाफ़ करेगा.
हालांकि इसके उलट बागपत में जाटों के बड़े नेता और चौधरी चरण सिंह के वारिस अजित सिंह को लोकसभा चुनावों में हराने वाले बीजेपी नेता सतपाल सिंह इन धमकियों को कुछ लोगों की सोच बताते हैं और दावा करते हैं कि अभी भी समुदाय का अधिकांश वर्ग नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यक़ीन रखता है और 2019 आम चुनावों में भी बीजेपी के साथ खड़ा रहेगा.
पूर्व आईपीएस सतपाल सिंह कहते हैं कि जितने जाने-माने जाट नेता हैं वो बीजेपी के साथ हैं.
''याचना नहीं रण होगा, संग्राम महाभीषण होगा,'' ऑल इंडिया जाट आरक्षण बचाओ महाआंदोलन के प्रमुख संयोजक धर्मवीर चौधरी भावुक होकर बातों के बीच ये नारे लगाने लगते हैं और कहते हैं, ''जाट ख़ुद को ठगा सा महसूस कर रहा है, उसके वोट से बीजेपी ने केंद्र और फिर उत्तर प्रदेश में कुर्सी तो हासिल कर ली लेकिन उसे उसका हक़ नहीं दिया गया.''
जाट नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जिस बैठक का ज़िक्र कर रहे हैं वो 26 मार्च, 2015 को सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के बाद हुई थी. इस फ़ैसले में अदालत ने कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार के ज़रिये जाटों को पिछड़ी जातियों की श्रेणी में केंद्र में दिए गए आरक्षण को रद्द कर दिया था.
उस बैठक के बाद बीजेपी नेता ओपी धनकड़ ने मीडिया से कहा था कि समुदाय ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि वो अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका दर्ज करवायें और अगर उसमें किसी तरह की दिक्क़त आती है तो विधायिका जाट आरक्षण मामले का निपटारा करे.
ओपी धनकड़ ने कहा कि प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि 'इसका जो भी रास्ता निकलेगा सरकार उसमें आगे बढ़ेगी.'
इस बैठक के बाद तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय समिति भी बनाई थी लेकन जाट नेताओं के मुताबिक़ इसकी एक भी बैठक नहीं हुई.
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के यशपाल मलिक दावा करते हैं कि बीजेपी को जाटों की याद फिर साल 2017 में उत्तर प्रदेश चुनावों के पहले आई जब अमित शाह ने समुदाय के लोगों को बैठक के लिए बुलाया और समर्थन का आग्रह किया.
2009 से कई बड़े जाट आंदोलनों का सामना कर चुकी मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने ठीक आम चुनावों से पहले 4 मार्च, 2014 को जाटों को केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में ओबीसी वर्ग के भीतर आरक्षण दे दिया था.
लेकिन इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और अदालत ने इसे 17 मार्च, 2015 को निरस्त कर दिया.
यूपीए सरकार का ये आरक्षण उन नौ सूबों के लिए लागू था जहां जाट ओबीसी सूची में शामिल हैं.
साल 1998 में राजस्थान में जाटों को दिए गए आरक्षण के बाद इस समुदाय को दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, बिहार, उत्तराखंड और हरियाणा में भी ये हक़ हासिल हो चुका था.
हरियाणा का मामला हालांकि फ़िलहाल अदालत में है.
सत्तर के दशक में बने मंडल कमीशन से बाहर रह गए जाट समुदाय के लोग कहते हैं कि निजीकरण और वैश्वीकरण की वजह से सरकारी नौकरियों में कमी आई है और शैक्षणिक रूप से पिछड़े जाटों को प्राइवेट सेक्टर में नौकरी मिलना मुश्किल है इसलिए उन्हें ओबीसी कैटेगरी में रिज़र्वेशन मिलना चाहिए.
यशपाल मलिक कहते हैं, "जिस ओबीसी लिस्ट में लागू होते वक़्त 1200 जातियां शामिल थीं उसकी संख्या अब 2453 जातियों तक पहुंच गई हैं तो फिर जाटों को उस सूची से अलग क्यों रखा जा रहा है?"
बीजेपी के जाट नेता सतपाल सिंह कहते हैं कि वो ख़ुद समुदाय को आरक्षण दिए जाने का समर्थन करते हैं लेकिन समुदाय को ये समझना होगा कि आरक्षण से ही सब मसला हल नहीं होगा और फिर सामान्य वर्ग को मिले आरक्षण से जाटों को भी तो लाभ होगा.
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